आदमी के लिए ये बात हलाल नहीं है के वो अपनी बीवी या अपनी महरम खवातीन के सिवा किसी दूसरी औरत को नज़र भर कर देखे. एक दफा अचानक नजर पड़ जाए तो वो माफ है, लेकिन ये माफ नहीं है कि आदमी ने पहली नजर में जहां कोई कशिश महसूस की हो वहीं फिर नजर दौड़ाये.
नबी सल्लम ने इस तरह की दीदा-बाज़ी को आंख की बदकारी से ताबीर (तुलना) फरमाया है. आपका इरशाद है कि-
आदमी अपने तमाम हवास (आवयवों) से ज़िना (व्याभिचार) करता है.
देखना आंखों का ज़िना है.
लगावट की बातचीत जबान का ज़िना है.
आवाज से लज़्ज़त लेना कानों का ज़िना है.
हाथ लगाना और नाजायज मकसद के लिए चलना हाथ-पांव दोनों का ज़िना है.
बदकारी की ये सारी तमहिदें (प्रस्तावनायें) जब पूरी हो चुकी हों तब शर्मगाह (गुप्तांग) या तो उसकी (व्यभिचार की) तक्मिल (पुरी) कर देती हैं या तक्मिल करने से रह जाती हैं.
(बुखारी मुस्लिम)
(तफहीमुल कुरआन जिल्द ३: हाशिया नं २९: सफ़ा नं ३८०)
ये है इस्लाम का महिलाओं के साथ व्यवहार का मियार (स्तर). अब इसके तनाज़ूर (पार्श्वभूमी) में आप सोचें के हमारा मुआशरा कहां खडा है?
▪️इस स्तर तक पहुंचना हम मुसलमानों का धार्मिक दाईत्व है. तो कोशिश किजिए के हम इस स्तर को पहुंचें. कोशिश आप और हम करेंगे तो यकिनन अल्लाह पाक की मदद आयेगी और एक सालेह मुआशरा (आदर्श समाज) वजूद (अस्तित्व) में आयेगा और इसकी बरकतों को देखकर अन्य समाज को भी ये ख़्वाहिश होगी के हमारा अनूसरण करें. यही असली जिहाद है. इसी से हमारा मुल्क-ए-अज़िज़ महासत्ता बनेगा. इस लिए के जिस क़ौम का नैतिक आधार मज़बूत होता है वही दुनिया का नेतृत्व कर सकती है।