Trending Now

रुदालियों के रोने से हालात नहीं बदलते

सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है। कथित रूप से उसमें दिखाया गया है कि एक स्कूल टीचर हिंदू बच्चों के हाथों से मुस्लिम बच्चे को थप्पड़ों से पिटवा रही है।

यह वीडियो मुस्लिम व्हाट्सएप ग्रुप्स में शेयर हो रहा है

हर ग्रुप में सियापा किया जा रहा है कि नफ़रत किस हद तक बढ़ गई है

कोई कह रहा है कि इस टीचर को जेल भिजवाना चाहिये

कोई कह रहा है कि मानसिकता कितनी गिर गई है

हर तरफ़ रुदाली ही रुदाली

पहले यह समझ लें कि रुदाली किसे कहते हैं?
रियासती दौर में जब किसी राजा-रजवाड़े या गाँव के ठाकुर या किसी रसूखदार घराने में किसी की मौत हो जाती थी तब पैसे देकर कुछ औरतें बुलाई जाती थीं जो नोहा कर-करके रूदन करती यानी आवाज़ें कस-कसकर रोया करती थीं
उन औरतों को “रुदाली” कहते थे

माफ़ कीजिएगा, हमने थोड़ी कड़वी मिसाल दे दी है लेकिन हक़ीक़त यही है कि हमारी एक बहुत बड़ी आबादी सोशल मीडिया पर सिर्फ़ रोना रोने में अपना क़ीमती वक़्त और मोबाइल डेटा बर्बाद कर रही है

पूरी क़ौम से हमारा सवाल है

क्या मिलेगा रुदाली बनकर?
ऐसी घटनाओं पर रोना-पीटना करने के बजाय इन्हें चुनौती के रूप में लीजिये
मुस्लिम समाज में पढ़े-लिखे नौजवानों की एक बड़ी तादाद मौजूद है
उनका इस्तेमाल किया जाए और हर गली-मोहल्ले में स्कूल खोले जाएं
नफ़रती जोम्बीज़ के साये से अपने बच्चों को बचाने की सकारात्मक कोशिश की जाए
यही बेहतर रास्ता है

बड़े-बड़े नामों वाली स्कूलों (जिनमें नफ़रती जोम्बीज़ टीचर हैं) वहाँ से अपने बच्चों को निकालकर मुस्लिम संस्थाओं द्वारा चलाई जा रही स्कूलों में दाख़िला दिलाया जाए

याद रखियेगा, होनहार बच्चे मामूली समझी जाने वाली स्कूलों में पढ़कर भी मेरिट में आते हैं

मुंशी प्रेमचंद ने कहा था कि अपमान को निगलकर जीना चरित्र के पतन की अंतिम सीमा है
इज़्ज़त के साथ जीना हमारा अधिकार है
इज़्ज़त के साथ पढ़ना हमारे बच्चों का अधिकार है

वीडियो में दिखाए गये बच्चे के गाल पर लग रहे थप्पड़ों को अपने गाल पर महसूस कीजिये
इस अपमान को अपना अपमान समझिये
नफ़रत के स्कूलों का बहिष्कार करना ही होगा

जब तक हम अपने शिक्षण संस्थानों की चेन क़ायम नहीं करेंगे तब तक कोई तस्वीर नहीं बदलेगी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *