सल्तनत उस्मानिया के एक सुल्त़ान को अपने पुराने मह़ल को गिराकर नया मह़ल बनाने की सूझी , सुल्त़ान ने अपने वज़ीरों से कहा कि कोई माहिर इंजीनियर तलाश करो जो हमारे मह़ल को गिराकर इससे बेहतरीन मह़ल बनाकर दे…एक वज़ीर ने सुझाव दिया कि मैं एक बहुत ही माहिर इंजीनियर को जानता हूँ और वही आपके स्टैंडर्ड पर पूरा भी उतर सकता है…सुल्त़ान ने उस इंजीनियर को बुलाया और उसे अच्छी तरह समझाया कि तुम्हें किस तरह और कैसे मेरी पसंद का मह़ल बनाना है..इंजीनियर ने सुल्त़ान की ख़्वाहिश को समझते हुए मह़ल बनाने का ठेका ले लिया..यहां तक तो मामला कुछ नया नहीं लेकिन सुल्त़ान बड़ा होशियार था वह इंजीनियर के साथ साये की तरह लगा रहता था और उसके हर काम पर बारीक नज़र रखता था..पुराना मह़ल जब पूरी तरह गिर गया और नया मह़ल बनाने के लिए ज़मीन बराबर कर दी गई तो इंजीनियर ने एक ऐसा काम किया जिसने सुल्त़ान की तवज्जो अपनी तरफ़ खींच ली..दरअसल इंजीनियर ने जिन मजदूरों से मह़ल गिराने का काम लिया था उन तमाम मज़दूरों की छुट्टी कर दी और मह़ल की तामीर के लिए नये राज मिस्त्रियों और मज़दूरों को भर्ती किया..यही बात सुल्त़ान के तवज्जो की वजह बनी थी तो सुल्त़ान ने दूसरे दिन इंजीनियर को अपने दरबार में बुलाया और सवाल किया कि तुमने मह़ल गिराने वाले मज़दूरों को फ़ारिग़ क्यों कर दिया?इंजीनियर ने बहुत ही कम लफ़्ज़ों में मुख़्तसर सा जवाब देकर सुल्त़ान को ह़ैरत में डाल दिया…
“ह़ूज़ूर जो लोग तख़रीब में महारत रखते हैं वह ता’अमीर करने के क़ाबिल नहीं होते“
लिखने का मक़स़द आज उस नफरती स्कूल टीचर की करतूत है जिसने एक मास़ूम बच्चे को भी नहीं बख़्शा—-ह़ालांकि ख़ुद उस टीचर के धर्म ने ही उस्ताद को भगवान का एक रूप माना है..लेकिन वेल एजूकेटेड होते हुए भी उस टीचर को अपने धर्म की बुनियादी तालीम भी नहीं मालूम या फिर ह़सद और नफ़रत ने उसे इतना अंधा कर दिया है कि वह “तख़रीब” के अलावा कुछ सोचने समझने के क़ाबिल ही नहीं..
ऐसे लोगों से आप “ता’अमीर” की उम्मीद नहीं रख सकते! लेकिन अफसोस आज मुसलमानों के बच्चे ऐसे ही निजी स्कूलों में तालीम हासिल कर रहे हैं बावजूद इसके कि खुद के इलाके में मुसलमानों द्वारा चलाये जा रहे स्कूल मौजूद हैं।