जब आज का मुसलमान बद्दीनी को ही दीन समझ रहा हो तो वह क्या गैर मुस्लिमों में इस्लाम को लेकर गलतफहमी को दूर करेगा, उल्टा अगर किसी को समझाने की कोसिश करो भी तो वह हमें ऐसे लोगों को सामने खड़ा कर आईना दिखा देते है कि देखो यह सच्चाई है।
एक भाई ने क़ुरआन पर सवाल खड़ा किया कि आपका अल्लाह तो झूठ बोल रहा है वह क़ुरान में कहता है कि “बेशक नमाज़ बेहयाई और बुराई से रोकती है, लेकिन मुसलमान तो नमाज़ भी पढ़ते है और गलत काम भी करते है ?
तो उन्हे बतलाया गया कि क़ुरआन में अल्लाह ने यह फरमाया है कि बेशक नमाज़ बेहयाई और बुराई से रोकती है, यह नहीं फरमाया कि नमाज़ पढ़ने वाला बेहयाई और बुराई से रुक ही जाता है ।
यह ठीक इस तरह से है की रोड की रेडलाईट सिंगनल ट्रैफिक को रुकने के लिये होती है, अब क्या हर ड्राइवर रेडलाईट देखकर रुक ही जाता है ?
अब इसमें गलती ड्राइवर की है या रेडलाईट की ?
वही एक जगह एक मुस्लिम भाई को बात करते सुना कि
“मुसलमानों की जितनी तादाद जुमे में आती है अगर उतनी तादाद फ़ज्र की नमाज़ में आने लगे तो मुसलमानों को ग़लबा नसीब हो जाएगा।”
हमारे नज़दीक ये एक सतही क़िस्म की जज़्बाती बात है, जबकि हक़ीक़त ये है कि
“मुसलमानों की जितनी तादाद फ़ज्र की नमाज़ में शरीक होती है अगर उसकी आधी तादाद भी नमाज़ का मक़सद समझ ले और नमाज़ को अदा करने के साथ-साथ उसके तक़ाज़ों को भी पूरा करने की फ़िक्र कर ले तो ख़ुद मुसलमानों के अन्दर वो बड़ी तब्दीली आ जाएगी कि फिर उन्हें उरूज पर पहुँचने से दुनिया की कोई ताक़त रोक नहीं सकती।
इसके बरख़िलाफ़ अगर इसी तरह की बे-मक़सद, बे-जान और रस्मी नमाज़ें पढ़ी जाती रहीं तो जुमे की नमाज़ में शामिल होने वाली भीड़ तो क्या, मुसलमानों की सद-फ़ी-सद तादाद भी नमाज़ में शरीक होने लगे तो सूईं की नोक की बराबर भी तब्दीली आनेवाली नहीं है। और जब तक अन्दर तब्दीली नहीं आएगी तब तक किसी उरूज और तरक़्क़ी का ख़्वाब देखना भी किसी बेवक़ूफ़ी से कम नहीं है।”
यक़ीन जानिये नमाज़ की ताक़त उसके मक़सद और तक़ाज़ों को पूरा करने में है, न कि बे-मक़सद, बे-रूह और रस्मी नमाज़ें पढ़े चले जाने में।
तेरा इमाम बे-हुज़ूर, तेरी नमाज़ बे-सुरूर
ऐसी नमाज़ से गुज़र, ऐसे इमाम से गुज़र