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आस्तीन के साँप

देश के हर थाने में सत्तर फीसदी मुखबिर मुस्लमान है।

दिहातों में एक कीड़ा पाया जाता है, जिसे गोबर का कीड़ा कहा जाता है उसे गाए, भैंसों के गोबर की बू बहुत पसन्द होती है,

वह सुबह उठकर गोबर की तलाश में निकल जाता है और सारा दिन जहां से गोबर मिले, उसका गोला बनाता रहता है, शाम तक अच्छा खासा गोला बन जाता है, फिर उस गोले को धक्का देते हुए अपनी बिल तक ले जाता है, लेकिन बिल पर पहुंच कर उसे एहसास होता है, कि गोला तो बड़ा बना और बिल का सुराख छोटा है, बहुत कोशिशों के बावजूद भी गोला बिल में नहीं जा सकता, और वह उसे वहीं पर छोड़कर बिल के अन्दर चला जाता है।

यही हाल दुनिया के हवस परस्तों का होता है, यह दुनिया की हर ऐश आराम के लिये अपने भाई और कौम तक का सौदा कर देते हैं और यह भूल जाते है कि इन्हे मरन है…

अगर हम तारीख़ को उठाकर देखें तो सबसे ज्यादा नुक्सान अगर किसी ने मुसलमानों को पहुँचाया है तो यह आस्तीन के साँप ही सबसे आगे रहे है, इन्होने जब भी बातिल को ताकतवर देखा है इन्होने खुद को उसके आगे झुका दिया है ।
और आज हालात ऐसे हो चुके है कि चारो तरफ ऊपर से नीचे तक हमें ऐसे लोग नजर आते हैं किस पर भरोसा करे कोई कुछ नहीं कहा जा सकता।

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