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शान्ति की स्थापना कैसे ?

मनुस्य की रचना से पहले सर्वोत्तम अद्दितीय अनुपम अनूठे रचनाकार ने इस संसार की रचना की जिससे पृथ्वी पर मानवीय जीवन सम्भव हो सके ।उसने सम्पूर्ण ब्रह्मांड को बनाकर उसकी एक निश्चित कार्य शैली निर्धारित की अगर इसमें थोड़ी सी भी कमी या अधिकता हो जाये, तो जो चीज़े इंसानी जीवन के लिये अतिउपयोगी है यही चीज़े उसके विनाश का कारण बन जायेगी, पालनहार ने धरती और तमाम ग्रहों की संतुलित दूरी और उनका संतुलित गति में घूमना इत्यादि निर्धारित किया।

“और वह अल्लाह ही है, जिसने रात और दिन की रचना की और सूर्य और चांद को उत्पन्न किया, सब एक. एक फ़लक (आकाश) में तैर रहे हैं।“
(सूर: 21 आयत 33 )

धरती, चाँद और सूरज की जो दूरी है अगर वह कम हो जाये तो सबकुछ खत्म और अगर यह दूरी बढ़ जाये तो भी सबकुछ खत्म, धरती धीमें घूंमें तो भी सबकुछ खत्म और यदि तेज घूमें तो भी सबकुछ खत्म, यह तमाम बातें विचारणीय है अल्लाह और उसकी क़ुदरत एवं शक्ति को पहचानने के लिये ।

“न सूर्य के बस में है कि वह चांद को जाकर पकड़े और न ‘रात’, ‘दिन पर वर्चस्व ले जा सकती है , यह सब एक एक आकाश में तैर रहे हैं।”
(सूर: 36 आयत 40 )

इंसानी जीवन के लिये हवा और बारिश का होना बहुत जरूरी है , अगर यह न हो तो भी इंसानी जीवन सम्भव नहीं , लेकिन अगर बारिश बंद ही न हो , और हवा तूफान का रूप लेलें तो यह अज़ाब यानि प्रकोप बन जाया करता है , यानि किसी भी चीज़ का न होना घातक , ज्यादा होना घातक, कम होना घातक यानि इंसानी जीवन के लिये हानिकारक होता है।

इसी तरह हम अगर अपने अंदर शरीर के अंगो उनकी बनावट और उनकी कार्यशैली पर नजर डाले तो यही तमाम बातें मिलेगी, शरीर का तापमान, शुगर लेवल, ब्लड प्रेशर, हार्ट बीट हर किसी का होना बहुत जरूरी है, अगर यह तमाम बातें कम हो तो भी इंसान बीमार और अगर ज्यादा हो तो भी इंसान बीमार, इलाज जरूरी है वरना मौत यकीनी है । यानि महान रचनाकार अल्लाह/परमेश्वर ने सबकुछ संतुलित बनाया है।

“तुम रहमान (परम दयालु, अल्लाह) की रचना में किसी तरह की विसंगति कमी नहीं पाओगे।”
( कुरान, 67:3)

अब यहाँ हमें विचार करना आवश्यक है कि अगर हम शानि सफलता और प्रसन्न रहना चाहते है तो हमें अपने जीवन को पालनहार के बताये नियम निर्देशों पर लाना होगा तभी हम इहलोक और परलोक में सफल हो सकते हैं अन्यथा मन का भ्रम है जो सोचना समझना है समझते रहें।

हम प्रकृति को देखे और विचार करें, हम पशुओं को देखे और विचार करें …
भोजन यानि खाना इंसान के अति महत्वपूर्ण है लेकिन यदि कोई सिर्फ खाने के लिये ही जीवित रहे तो यह जीवन उसके लिये अभिषाप है।

धन दौलत बच्चे विवाह घर मकान सब मानवीय आवश्यकतायें है लेकिन यदि कोई अपना सारा जीवन इन्ही चीज़ो को प्राप्त करने में लगा दें तो यह जीवन उसके लिये अभिषाप है, सांसारिक सुख सुविधाओ को प्राप्त करने दिखलावे नाम एवं शोहरत के लिये इंसान को इंसान से लड़ा दे, झूठ बोले रिश्वत ले और प्रकार के भ्रष्टाचार में लिप्त हो जाये तो यकीनन वह एक ऐसे रोग की पकड़ में आ चुका है जो रोग उसे नर्क यानि जहन्म में लेकर जायेगा।

दीन अथवा धर्म को रब ने भेजा ही इसलिये है ताकि इंसान एक सामाजिक प्राणी बन सके, उसे समाज में रहने का सलीका आ जाये और वह मानवता के उच्चतम शिखर पर बैठ जाये…
जिस प्रकार इंसानी बोडी पार्टस उसकी अपनी बोडी के लिये कार्य करते हैं दूसरों का उनसे कोई मतलब नहीं होता, इसी प्रकार मानवीय दिमाग भी स्वार्थी होता है सिर्फ अपने लाभ और फायदे के बारे में सोचता है, अब अगर संसार का हर इंसान सिर्फ अपने फायदे के लिये जीने लगे तो हर ओर अशान्ति और हिंसा दिखाई देगी जो कि आजकल दिखाई भी दे रहा है ।

आज के समय में अशान्ति और हिंसा का मुख्य कारण इंसान ईश्वरीय शिक्षाओं से कट चुका है, और अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिये अपने मतलब के दीन-धर्म का निर्माण स्वयं कर लिया है।

रब कहता है दान दो इससे माल में बृद्धि होगी और माल पवित्र होगा लेकिन दिमाग कहता है कैसी अजीब बात है यह भला दान देने से भी माल बड़ता है मेरे पास सौ रुपये थे 20 दे दिये अब तो 80 ही बचे।

रब कहता है ब्याज निषेध है माल हराम है लेकिन दिमाग कहता है कैसे मेरी तो सारी सुख सुविधायें इसी ब्याज के पैसे से हैं??.

जो इंसानी दिमाग रब के बताये नियमों के आगे नतमस्तक हो कर चलेगा वही सफल होगा उसे विश्वास होगा कि मेरे रब मेरे अल्लाह मेरे परमेश्वर ने बतलाया है कि दान देने से धन बढ़ेगा, तो हर हाल में बढ़ेगा मेरा दिमाग कुछ भी कहें, इंसान सही दीन धर्म पर नहीं आयेगा तब तक इसी तरह हर ओर अशान्ति और हिंसा दिखाई देती रहेगी । हर धर्म की धार्मिक पुस्तकों में यह शिक्षायें लिखी हुई है बस भाषाओं का अंतर है लेकिन आज इंसान समझना ही नहीं चाहता।

“ऐ लोगों, हमने तुम्हें एक पुरुष और एक स्त्री से पैदा किया। और तुमको जातियों और परिवारों में बाँट दिया, ताकि तुम एक दूसरे को पहचानो। निस्सन्देह अल्लाह के निकट तुम में से अधिक सम्मान वाला वह है जो सबसे अधिक परहेज़गार (संयमी) है। निस्सन्देह अल्लाह जानने वाला, ख़बर रखने वाला है।”
(क़ुरआन 49:13)

जिसने किसी निर्दोष की हत्या की मानो उसने सारे इंसानों की हत्या कर दी, और जिसने किसी की जान बचाई मानो उसने सारे इंसानों की जान बचाई”
(क़ुरआन 5:32)

“जो कुछ तुम्हारे पास ( दुनिया में ) है वह (एक दिन) खत्म हो जाएगा और जो अल्लाह तआला के पास है वह हमेशा बाकी रहने वाली चीज़ है।”
(क़ुरआन 16:96)

“अनाथों और निर्धनों के साथ अच्छा व्यवहार करों, और लोगों से भली और अच्छी बात कहो !!”
(क़ुरआन 2:83)

“हमने जो कुछ तुम्हें दिया है उसमें से खर्च करो। इससे पहले कि तुममें से किसी की मृत्यु आ जाये, फिर वह कहे कि ऐ हमारे पालनहार, तूने मुझे कुछ और अवकाश क्यों न दिया कि मैं दान करता और भले लोगों में सम्मिलित हो जाता।”
(क़ुरआन 63:10)

“अल्लाह की दी हुई जीविका से खाओ और पिओ और ज़मीन में बिगाड़ फैलाने वाले बनकर न फिरो”
(क़ुरआन 2:60)

लेख: अब्दुर्रहमान ह्युमनिस्ट

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