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आत्मा, दुरात्मा, महात्मा

लोग अपनी भाषा मै या जिस धर्म का हम पालन करते हैं उसके आधार पर आत्मा को रूह, पवित्र आत्मा, चेतना या महा-चेतना भी कहा जाता है। बहुत से लोग उसे वास्तविक आत्मा, अमर आत्मा, शुद्धात्मा और आत्मा भी कहते हैं। फिर भी, आत्मा क्या है ?

आत्मा सर्वशक्तिमान जगत स्वामी स्रष्टा का आदेश है, आत्मा प्रत्येक जीवमात्र में होती है। उनका स्वभाव एक समान है, यानि प्रत्येक आत्मा के गुण समान होते है। अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत शक्ति और अनंत सुख आत्मा के मुख्य गुण हैं।

मानव, बेमिसाल रचनाकार की श्रेष्ठतम रचना है, इसी लिये उस सर्वशक्तिमान ने इसे सर्वोत्तम बुद्धि एवं विवेक के साथ पैदा किया है, जिससे यह भले और बुरे की पहचान कर सके और अच्छाईयों के साथ परमेश्वर के आदेश पर अपने जीवन को व्यतीत करें।

मनुस्य के कर्मों के आधार पर आत्माओं को कई श्रेणियों में बांटा जा सकता है। हम आत्माएं पाप आत्मा , दुरात्मा, पुण्यात्मा ,धर्मात्मा, महात्मा या देवात्मा बन सकती है लेकिन परमात्मा नहीं बन सकती परमात्मा तो केवल एक है जो सदैव परम पवित्र , निराकार ,अभोक्ता, अजन्मा , जन्म मरण रहित,सुप्रीम सोेल, रचईता , सर्व श्रेष्ठ, सर्व शक्तिमान, प्रेम का सागर, शांति का सागर,सुख का सागर है,रहम दिल है और वही उपासनीय है।

हम महात्मा यानि महान आत्मा हैं या दुरात्मा इसके विस्लेषण के लिये हमें चिंतन करने की आवश्यकता है, हम सोंच विचार करें कि हमारी दिनचर्या मानवता की भलाई के लिये है या हम मानवता के विनाशक है, महात्मा की सोच और कर्म मानवता के लाभ के लिये अपनी सम्पूर्ण इच्छा शक्तियों को लगा देने की होती है, जब कि दुरात्मा के पास अपनी कोई सोच नहीं होती है, वह अपने थोड़े से निजी लाभ और स्वार्थ के लिये अपने भाई और पिता तक का गला घोंट सकता है ।

हमें देखने की आवश्यकता है कि हमारी दिनचर्या किसे सुनने देखने और करने में लगी हुई है, आज टीवी मीडिया , सोसल मीडिया पर प्रसारित होने वाले समाचार शेयर होने वाली पोस्ट मानव जीवन को मनोरोगी बना रही है, अगर हम यही सब देखते है लिखते है तो आज नहीं तो कल हमारी आत्मा को यह काला करके दुरात्मा अवश्य बना देगी, हमारे बच्चे हमसे क्या शिक्षा लेगें जब हम स्वयं दुरात्मा बन चुके होगें ?

वह सच्चा है धर्म अनुयाई ,
जिसने मानवता की अलख जलाई !!
और यही मनुस्य महात्मा कहलाने का अधिकार है ।

विचार करिये हम किसी को एक समय का भोजन नहीं देते लेकिन उसकी दुकान को आग लगाकर उसके पूरे जीवन को भोजन विहीन बनाने का माध्यम बन चुके हैं ?

हम सभी बहुत शीघ्र अपने कर्मों के साथ अपने पालनहार के समक्ष उपस्तिथ होने वाले है जहाँ हमें अपने प्रत्येक कर्म का उत्तर देना होगा, जीवन बहुत क्षणिक है हर पल कोई न कोई इस संसार से जा रहा है, अगला नंम्बर मेरा और आपका भी हो सकता है, क्या हमने स्वयं को तैयार कर रखा है परमात्मा के प्रश्नोत्तर के लिये ?


लेखक: अब्दुर्रहमान ह्युमनिस्ट

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