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कर्बला और इतिहास

देश में बढ़ती नफरत की एक बड़ी वजह इतिहास भी है, हमेशा ही एक बात निकलकर सामने आती है कि मुगलों ने तलवार के जोर पर इस्लाम फैलाया, मुगलों ने मन्दिरों को गिराकर मस्जिदें बनवाई, औरंगजेब ऐसे थे बाबर ऐसा था और दूसरा कोई बादशाह ऐसा, हालात ऐसे हो चुके है कि हम स्कूली किताबों से मुगलो के पाठ्य निकाले जा रहे है, शहर , सड़क और गार्डेन जो कभी मुगलों के नाम पर थे उनके नाम बदल दिये गये, मुगल काल क्या था कैसा था किसी को नहीं मालुम जो आज बताया जा रहा है उसी सच्चाई को लोग मान रहे हैं । मुगलों के दौर से आज के दौर तक ऐसा कोई जिक़्र हमें नहीं मिलता कि हमारे मुल्क में इतिहास को मिटाया गया हो , बावजूद इसके आज लोगों के पास उस दौर की मुकम्मल और सही जानकारी बहुत कम है ।

इतिहास शब्द इति + हास शब्द से मिलकर बना है, जिसमे इति का अर्थ ‘बिती हुई’ तथा हास शब्द का अर्थ ‘घटित हुयी कहानी’ होती है। अतः हम कह सकते हैं कि अतीत का अध्ययन इतिहास कहलाता है।

घटित घटनाओं या उससे तआल्लुक रखनेवाली घटनाओं का दौर तफ्सील के साथ लाईन बद्ध लिखना इतिहास कहलाता है। दुसरे शब्द में हम यह भी कह सकते हैं कि ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर गुजर चुकी घटनाओं का जिक़्र इतिहास कहलाता है। यानि आज घटती घटना कल का इतिहास है।

कर्बला का किस्सा इतिहास है, क्यों कि अल्लाह ने अपने दीन को तो आज से लगभग साढ़े 1400 साल पहले ही मुकम्मल पूरा कर दिया करीब सन 632 ईसवी को, इस आयत के साथ…

“आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन मुकम्मल कर दिया और मैंने तुम पर अपना एहसान पूरा कर दिया और मैंने तुम्हारे वास्ते इस्लाम ही को दीन पसंद किया है”
(अल क़ुरआन , सुरह अल मायदा (5), आयत 3)

दीन अमल के लिये होता है और इतिहास पिछली गल्तियों से शिक्षा लेने के लिये । इतिहास की व्याख्या तीन तरह से होती है।
एक इतिहास जो हम जानते है,
दूसरा इतिहास जो आप जानते है और तीसरा इतिहास जो वास्तविक होता है।
वास्तविक इतिहास वही जानता है जो उस कालखंड में उपस्थित रहा हो और उस घटना का गवाह रहा है।
बाक़ी सब अपने अपने व्याख्या को दुरुस्त मानकर अपनी अपनी डफली बजाते रहते हैं।

कर्बला की जो सच्चाई हमारे आपके सामने है या जो हमें बताई जाती है यह कितनी सही हम तक पहुँची है इस बात में भी संसय है, क्यों कि कर्बला और हमारे बीच वैसे तो कई महत्वपूर्ण इतिहास और है स्पेन की तबाही के भी इतिहास है और सल्तनते उस्मानिया की तरह ऊरूज के भी, लेकिन एक इतिहास जिसका लिखना यहाँ जरूरी है, वह है मंगोलों का इतिहास,

किसी समय इस्लामिक विद्वानों का मुख्य केन्द्र इराक और बगदाद था और इतिहास हमें बताता है कि 13 फरवरी 1254 को हलाकू खान अपनी मंगोल सेना के साथ बगदाद शहर में घुस आया और एक हफ्ते तक वहां जमकर कत्लेआम मचाया। इसके अलावा मंगोलों ने वहां मौजूद पुस्तकालयों, महल, मस्जिदों और अन्य इमारतों में भी आग लगा दी। कहते हैं कि किताबों से बहती हुई स्याही से दजला नदी का पानी काला हो गया था।

कहते हैं कि बगदाद के खलीफा को तो मंगोलों ने बुरी तरह मौत दी। उसे एक कालीन में लपेट दिया गया और उसके ऊपर से तब तक घोड़े दौड़ाए गए, जब तक उसने दम नहीं तोड़ दिया। एक इतिहासकार के मुताबिक, खलीफा को भूखा मारा गया।

कहा जाता है कि हलाकू खान के आक्रमण से पहले ईरान हो ईराक में सभी विद्वान अरबी भाषा में ही लिखा करते थे। बगदाद की ताकत नष्ट होने से ईरान में फारसी भाषा फिर पनपने लगी और उस काल के बाद ईरानी विद्वान और इतिहासकार फारसी में लिखने लगे। अब कितना इतिहास हम तक सही पहुँचा है कहना मुश्किल है, बावजूद इसके आज हमारे उलमा मुहर्म में जब कर्बला का वाकिया बता रहे होते हैं तो अंदाज ऐसा होता है कि जैसे लाईव बयान दे रहे हो, इतना चीखना चिल्लाना ।

ऐसा नहीं है कि इतिहास को लेकर सिर्फ हमारे हिन्दू भाइयों में ही नफरत पनप रही है, उससे कहीं ज्यादा कर्बला को लेकर मुसलमानों में आपस में ही है, कितने बड़े बड़े उलमा इस मामले में लिखकर बोलकर लानतान का शिकार हुये। इसलिये मैं भी बहुत ऐतिआत के साथ लिख रहा हूँ, क्यों कि आज लोगों की मान्सिकता सिर्फ कमियाँ पकड़ना रह गई है।

इतिहास में हमने बहुत से मजलूमों के जनाजे देखें, लेकिन आज हमारे घरो से दीन का ही जनाजा हर रोज निकलता है उस पर न तो कोई मातम है न कोई नोहा है और न ही कोई फिक्र है ।

आज दीन के नाम पर हो रहे इन प्रोग्रामों में बेपर्दगी देखने को मिलती है, जेसे कि अल्लाह के हुक़्म का मखौल उड़ाया जा रहा हो…
तुम औरतें अपने घरों में ठेहरी रहो और जमानाये जाहिलियत की तरह बेपर्दा मत फिरो
(क़ुरआन 33:33)
नमाज़ का तो पूछो ही मत कितने लोग पढ़ते होगें, हज़रत इमाम हुसैन की नमाज़ जंग में भी न झूठी और उनसे मुहब्बत के दावेदार उन्ही के नाम पर नमाजे छोड़ रहे हैं। जबकि नमाज़ छोड़ने की ऐसी वईदे है कि रूह काँप जाये, एक जगह पर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहो अलैहिवसल्लम ने फरमाया..
आदमी और शिर्क़ ओ क़ुफ्र के बीच फर्क पैदा करने वाली चीज़ नमाज़ है। (Muslim: al Eman 82)

आज कौम की लाखों बच्चियाँ मुर्तद हो रही है, घर वापसी के नाम पर ऐलानिया अभियान चलाया जा रहा है, कारोबारी बायकाट की मुहिम चलाई जाती है, नमाज़ अदा करने पर जेल हो जाती है, शरियत से छेड़छाड़ की कोसिश होती है, और यह तय किया जाता है मुसलमान गोस्त कब खायेगा और कब नहीं खायेगा। लेकिन इन सब बातों पर इसे रोना नहीं आता ।

जिस दीन के लिये अल्लाह के रसूल सल. ने अपने खूँन से सींचा और परवान चढ़ाया, जिस दीन के लिये हजारों सहाबा ने अपनी जान का नजराना अल्लाह को पेश किया उस दीन को आज मिटाने के मंसूबे बनाये जा रहे हैं और इसे कोई फिक्र नहीं , आज कौम की दलाली करने वाला इंसान कौम में इज़्ज़त की नजर से देखा जाता है, अपने गिरेबानों में झाकों कि हमारे अमल किससे मेल खाते है ?

नसीहत लो इतिहास से और आपसी लानतान और एक दूसरे को मलामत करना छोड़ो और इत्तेहाद पैदा करो सर जोड़कर बैठो और फिक्र करो, कि मौजूदा सूरते हाल और दिन बा दिन बिगड़ते हालात पर क्या अमल किया जाये ?

यकीनन खानदाने रसूल से मुहब्बत एक मुसलमान का फितरी मामला है, लेकिन हमसे हमारे अमलों का हिसाब होगा हमारे बारे में पूछा जायेगा, मौजूदा दौर और मौजूदा लोगों के बारे में पूछा जायेगा गुजरे हुये लोगों के बारे में नहीं ।

“वो कुछ लोग थे, जो गुज़र गए जो कुछ उन्होने कमाया, वो उनके लिये है और जो कुछ तुम कमाओगे, वो तुम्हारे लिये है तुम से यह न पूछा जाएगा कि वो क्या करते थे।”
(क़ुरआन 2:134)

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