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यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड, मुस्लिम आबादी और चार शादियों का प्रोपेगंडा

यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड एक राजनीतिक मुद्दा है जिससे भाजपा कई फ़ायदे हासिल कर रही है, वह अपने हिंदू वोटर्स को यह संदेश दे रही है कि हम इस तरह मुससलमानों को क़ाबू में रख रहे हैं।
भाजपा हमेशा अपने वोटर्स से कहती रही है कि देखो एक तरफ़ तो हिंदू कोड बिल पास कर के हिंदुओं की एक से ज़्यादा शादियाँ करने पर पाबंदी लगा दी गई, दूसरी तरफ़ मुसलमान चार शादियाँ कर के 25-25 बच्चे पैदा कर रहे हैं और बहुत ही योजनाबद्ध तरीके से अपनी आबादी बढ़ा रहे हैं ताकि इस देश में फिर से वे अपनी हुकूमत स्थापित कर सके और इसी रफ़्तार से उनकी आबादी बढ़ती रही तो 2040 तक हिंदुस्तान का प्रधानमंत्री मुस्लिम होगा और हिंदुस्तान में दोबारा मुग़ल राज आ जाएगा और हिंदू ग़ुलाम बन जाएगा। इसलिए मुस्लमानों को क़ाबू में रखना ज़रूरी है। यह वह डर है जो भाजपा हमेशा हिंदू मतदाताओं में पैदा करती रही है और आश्चर्य की बात है कि देश की एक बड़ी आबादी, जिसमें हिंदुओं का शिक्षित वर्ग भी शामिल है, ने इस कहानी को सच मान भी लिया है।

चार शादियों की बात प्रोपेगेंडा से ज़्यादा कुछ नहीं है, वास्तविक जीवन में मुश्किल ही से कोई ऐसा व्यक्ति दिखाई देता है जिसने कभी चार शादियाँ की हों। और व्यवहारिक रूप से ऐसा करना संभव भी नहीं है, तमाम मुस्लिम चार शादियाँ उसी वक़्त कर सकते हैं जबके उनके यहाँ मर्दों के मुक़ाबले औरतों की संख्या चार गुना ज़्यादा हो, 2011 जनगणनाके अनुसार मुसलमानों में लिंगानुपात (1,000 पुरुषों पर महिलाओं की संख्या) 951 है, यानी यहाँ पहले ही मर्दों के मुक़ाबले 49 औरतों की कमी है तो ऐसे में एक आदमी चार महिलाओं से शादी कैसे कर सकता है?। यदि कुछ पुरुष एक से अधिक विवाह करते हैं, तो कई पुरुषों को पत्नियाँ ही नहीं मिलेंगी | और किसी भी समाज में अविवाहित पुरुषों की संख्या उस संप्रदाय की प्रजनन क्षमता को नहीं बढ़ा सकती| कॉमन सेंस की बात है कि चार आदमी चार बीवियों के साथ ज़्यादा बच्चे पैदा करेंगे या फिर एक ही मर्द की चार बीवियाँ हों।

“नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 5” की रिपोर्ट यह बताती है कि एक से ज़्यादा शादियाँ करने का रिवाज सब से ज़्यादा ईसाईयों में 2.1% है, इस के बाद 1.9% मुसलमानों में, इस के बाद 1.6% दूसरे कम्युनिटीज़ में और हिंदुओं में यह 1.3% है। इसमें नोट करने की बात यह है कि मुसलमानों में यह प्रतिशत उस सूरत में है जब उनके यहाँ एक से ज़्यादा शादियाँ की कानूनी रूप से अनुमति है, जबके दूसरे कम्युनिटीज़ में कानूनी रूप से प्रतिबंधित है। इसके बावजूद यहां इतने बड़े पैमाने पर एक से ज्यादा शादियां हो रही हैं।

रहा सवाल मुसलमानोंकी बढ़ती हुई आबादी का, तो वह सबसे ज़्यादा तेज़ी से गिर रही है। अबू सालेह शरीफ इसकी विवरणा करते हुए लिखते हैं।

“The Muslim population has increased from 13.4 percent of the population to 14.2 percent, which is 0.8 percentage points higher. But the rate of growth is considerably lower than in previous decades. Muslims are expected to grow faster than Hindus for a couple of more decades because they have the youngest median age and relatively high fertility among the major religious groups in India. In 2010, the median age of Indian Muslims was 22, compared with 26 for Hindus and 28 for Christians. Muslim women bear an average of 3.1 children per head, compared with 2.7 for Hindus and 2.3 for Christians.”

‘Myth of Muslim growth’ Indian Express 2 September 2015

2001-11 की जनगणना रिपोर्ट के अनुसार, हिंदू आबादी में 13.88 करोड़ की वृद्धि हुई और संयोग से 2001 में मुस्लिम आबादी 13.8 करोड़ थी। इन संख्याओं का विश्लेषण करने के बाद “Denial and Deprivation” पुस्तक के लेखक अब्दुलरहमान साहब एक अद्भुत टिप्पणी लिखते हैं।

“What Hindus have added in 10 years took Muslims 1400 years of living in India.”

ये एक वाक्य बढ़ती मुस्लिम आबादी के गुब्बारे की हवा निकालने के लिए काफी है।

इन सभी तर्कों की रौशनी में, यह स्पष्ट हो जाता है कि मुस्लिम आबादी का शोशा केवल एक राजनीतिक प्रचार है, लेकिन जब सभी निर्णय भावनात्मक उत्तेजना और मुस्लिम विरोध में किए जाने हैं, तो तथ्यों और तर्कों के प्रकाश में चीज़ों का विश्लेषण करने का समय किसको है।

लेख: शबी उज़्ज़मां – पुणे

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