निज स्वार्थ में मनुष्य अंधा हो चुका है, मानवता पर दानवता हावी हो चुकी है, ढोंग व पाखंड फैलाकर सच्चे मालिक पालनहार का नाम बेचा जा रहा है, और मानवता अपनी अन्तिम सांसे गिन रही है, धर्म को आज धंधा बना लिया गया है और मानवता मात्र भाषणों तक सीमित रह गई है।
आज लोग मंगल पर जीवन तलाश रहे हैं, जबकि पृथ्वी वासियों का जीवन जंगल बना हुआ है, प्रतिदिन करोड़ो लोग भूखे पेट सोते हैं, प्रतिदिन हजारों बच्चे भूख से मरते हैं, ऐसा नहीं है कि दुनियाँ में खाने की कमी है, हर साल दुनियाँ में चालीस प्रतिसत भोजन व्यर्थ होता है।
यहाँ बेजान पेन्टिंग और तश्वीरों पर करोड़ो खर्च किये जाते है और जिन्दा लोगों के घर मकान जलवा दिये जाते हैं, यहाँ धनवान का एक ट्वीट करोड़ो में बिकता है और निर्धन के अनमोल विचारों को कोई पढ़ने वाला भी नहीं मिलता ।
धर्म मानवता को उसके उच्चतम शिखर पर पहुँचाने का नाम है लेकिन आज उसी धर्म के नाम पर मानवता को तारतार किया जा रहा है, अफसोस ।
” क्या तुमने नहीं देखा उस व्यक्ति को जो न्याय के दिन यानि परलोक को झुठलाता है। यह वही है जो अनाथ को धक्के देता है। और निर्धन को खाना देने पर नहीं उभारता तो विनाश है उन नमाज़ पढ़ने वालों (उपासना करने वालों) के लिए। जो अपनी नमाज़ यानि उपासना से बेपरवाह हैं। यह वह हैं जो दिखावा करते हैं। और साधारण आवश्यकता की वस्तुएँ भी नहीं देते।” (क़ुरआन 107:1-7)
अब्दुर्रहमान ह्युमनिस्ट