दिल दहलाने वाली चीख़ें सुनकर मेरे आस-पास की दुकानों से लोग ढलान की तरफ़ भागे। वहाँ बरसात में बारिश की वजह से लोग अक्सर फिसलते रहते हैं।
क्यों कि कभी ऊपर मुहब्बत बेगम रहा करती थीं। उसके घर के सामने सरकारी ज़मीन पर 10-12 पेड़ थे। उन्हें वार्ड के सभासद चिन्टू ने विकास के लिए कटवा दिए थे और उनके बदले में पेड़ न लगवाए थे। जब से मुहब्बत बेगम के पेड़ कटे, तब से ढलान पर फिसलन और बढ़ गई थी। चाईनीज़ हवाई चप्पल वहाँ फ़ेल हो जाती थी। विकास यह हुआ था कि पेड़ बेचकर रूपए सभासद चिंटू खा गया था और मुहल्ले के युवा वहां बैठकर लोगों के गिरने की रील्स बनाते रहते हैं।
ढलान से उतरकर एक युवक आ रहा था। शायद वह वीडियो बना चुका था। अब वह वीडियो एडिट करने के लिए घर जा रहा होगा। मुझे ख़ुशी है कि अब हर घर में एडिटिंग टेबल है वर्ना किसी मूवी की एडिटिंग केवल स्टूडियो में ही मुमकिन थी। जितने अंग हीरोइनें पैसे लेकर न दिखाती थीं, उससे ज़्यादा शरीफ़ घरों की लड़कियाँ अब मुफ़्त में दिखा देती हैं। युवाओं की सोच बदली है। इन्हीं युवाओं के हाथों में हमारा फ़्यूचर है और ये फ़्यूहरर के सुरक्षित हाथों में हैं।
मैंने उस सुरक्षित युवक से पूछा- ‘क्या हुआ?’
उसने कहा-‘नफ़रत रपट कर गिरी थी, उसकी खोपड़ी टूट गई है।’
मैंने कहा-‘कौन है नफ़रत?’
युवक ने कहा कि ‘चिंटू की माँ’।
चिंटू को सब जानते हैं। वह अपने बाप को घर से निकालने के जुगाड़ में लगा हुआ है। कारण केवल यह है कि उसका बाप उसके मालिक से लड़ा था। चिंटू वफ़ादार है लेकिन अपने स्वामी का। मैंने पूछा-
‘क्या नफ़रत मर जाएगी?’
युवक ने कहा-‘नहीं लेकिन ठीक होने में साल भर लगेगा।’
मैं सोचने लगा कि ‘इतने लंबे वक़्त तक बिना नफ़रत के चिंटू का गुज़ारा कैसे होगा?, नफ़रत अपनी खोपड़ी टूटने का इल्ज़ाम किसके सिर धरेगी?’
वैसे नफरत को भी अब थोड़ा सा अहसास हुआ है उसका कहना हैं कि अगर आप सबकी दुआओं से मैं एक साल में ठीक हो गई तो अपना नाम बदलकर मुहब्बत रख लूंगीं।
लेख: अब्दुर्रहमान ह्युमनिस्ट