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पैग़ामे-ए-कर्बला

हज़रते-हुसैन (रज़ि०) की शहादत के वाक़िए (घटना) को 1400 साल गुज़रने के बाद भी कर्बला के शहीदों की अज़मत को याद किया जाता है।
लेकिन ….
क्या हज़रते-हुसैन (रज़ि०) की शहादत की अज़मत का एतिराफ़ करते रहना ही हमारे लिए काफ़ी है?

क्या उनको मुख़्तलिफ़ तरीक़ों से ख़िराजे-अक़ीदत पेश करते रहने से हमारे ऊपर के फ़र्ज़ और ज़िम्मेदारियाँ पूरी हो जाती हैं?

क्या कर्बला के शहीदों पर ढाए गए मज़ालिम पर मातम करके और उनकी शहादत की रौशनी में अपनी ज़िन्दगी के लिए कोई राहे-अमल (कार्यशैली) मुतैयन न करके हम कर्बला के शहीदों से सच्ची अक़ीदत रखने वाले मोमिन कहलाने के हक़दार हो सकते हैं?

नहीं! हरगिज़ नहीं!!

अगर हम वाक़ई हुसैन (र०) से अक़ीदत रखते हैं तो ग़ौर करना होगा कि वो मक़सद क्या था जिसके लिए हुसैन (र०) ने अपनी जान तक क़ुर्बान कर दी थी?

जिनसे हुसैन रजि. का मुक़ाबला था क्या वो …
● इस्लाम छोड़कर काफ़िर हो गए थे?
● शिर्क करने लगे थे?
● रिसालत के मुनकिर हो गए थे?
● आख़िरत के मुनकिर हो गए थे?

ज़ाहिर है इनमें से कोई बात नहीं थी।
फिर क्या नऊज़ुबिल्लाह
● हुसैन (र०) हुकूमत और शान-शौकत के ख़ाहिशमन्द थे?
● दौलत और शोहरत के तलबगार थे?
तारीख़ (इतिहास) का मामूली मुताला करने वाला शख़्स पुकार उठेगा कि नहीं!..हरगिज़ नहीं।
फिर वो क्या बात है जिसके लिए हुसैन 72 लोगों के साथ उस शख़्स के आगे सीना तानकर खड़े हो गए जिसकी सल्तनत ज़मीन के बड़े हिस्से तक फैली हुई थी?

इस्लाम बुनियादी तौर पर तज़किया (गंदगियों और ख़राबियों को पाक करके पाकीज़गी की बुनियाद पर डेवेलपमेंट) चाहता है। ये तज़किया एक फ़र्द का भी होना चाहिये, ख़ानदान और समाज का भी। प्यारे नबी (स०) ने ये काम अपनी ज़िंदगी में अपने कमाल दर्जे तक करके दिखा दिया और क़ियामत तक के लोगों के लिये एक नमूना छोड़ दिया था। यानी प्यारे नबी (स०) ने एक फ़र्द से लेकर रियासत तक के तज़किया का काम अंजाम दिया और उसी काम को अपने साथियों को सौंप गए, जिन्होंने उस काम को बहुत अच्छी तरह अंजाम दिया।

आप (स०) ने रियासत की तशकील इस तरह की थी कि उसमें क़ानून किसी इनसान या इनसानों के किसी गरोह का बनाया हुआ नहीं था और इस हुकूमत को चलाने की ज़िम्मेदारी भी किसी ख़ास फ़र्द, ख़ानदान या किसी ख़ास गरोह की नहीं थी, बल्कि इस हुकूमत को चलाने की ज़िम्मेदारी अवाम के ज़रिए उन लोगों को सौंपी जानी थी जो दीन और शरीअत के सबसे ज़्यादा जानकार भी हों और वो सिर्फ़ जानकार ही न हों बल्कि अल्लाह से डरनेवाले भी सबसे ज़्यादा हों, यानी वो हक़ीक़ी तक़वा भी रखते हों।

जो——
 क़ानून भी अल्लाह का लागू करें लेकिन अपने-आपको क़ानून से बालातर न समझें,
 ख़ुदा से डरते हुए तमाम लोगों के साथ बेलाग तरीक़े से इनसाफ़ करने का हौसला रखते हों,
 अवाम को सेवक न समझते हों, बल्कि ख़ुद अवाम के सेवक हों।
ताकि हुकूमती सतह पर करप्शन के चांस कम से कम तर हों, समाज में ख़ुशहाली आए और अवाम सुख-चैन की साँस ले सके। (इस तरह की तर्ज़े-हुकूमत को इस्लामी इस्तिलाह में ख़िलाफ़त कहा जाता है)

तमाम वाक़िआत (घटनाक्रम) पर ग़ौर करने से मालूम होता है कि वाक़िआए-करबला में असल इख़्तिलाफ़ की जड़ ये थी कि मुहम्मद (स०) की (तज़किया की बुनियाद पर) क़ायम की हुई हुकूमत (ख़िलाफ़त) की बागडोर उस वक़्त ऐसे लोगों ने ज़बरदस्ती अपने हाथों में ले ली थी जो उसके अहल नहीं थे। जो…..

• बड़ा तो एक अल्लाह को ही मानते थे लेकिन हुकूमत पर क़ब्ज़ा करना अपना हक़ समझते थे।
• क़ानून तो अल्लाह ही का चलाते थे लेकिन अपने-आपको उस क़ानून से बालातर समझते थे।
• नमाज़ और रोज़े के तो पाबंद थे लेकिन अवाम के बैतुल-माल को अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ अपने ऊपर ख़र्च करने को अपना हक़ समझते थे।
• अपने लोगों के साथ बर्ताव अलग अंदाज़ से करते और दूसरे लोगों के साथ दूसरे अंदाज़ के करते थे।
फिर वो ज़बरदस्ती और ज़ुल्म के ज़रिए हासिल की हुई उस हुकूमत पर हज़रत हुसैन की भी बैअत चाहते थे।
बज़ाहिर ये बहुत मामूली सी तब्दीली थी लेकिन एक ग़ैरतमन्द और हक़-परस्त मोमिन होने के नाते वो इस ज़ुल्म और ज़बरदस्ती को कैसे बर्दाश्त कर सकते थे?

इसलिए अपनी जान-माल, घर-परिवार की परवाह किये बग़ैर हुकूमत के उस ज़ालिमाना निज़ाम को उखाड़ फेंकने के लिए तैयार हो गए।
असल में हुसैन (रज़ि०) बातिल पर पड़े हुए हक़ के झूटे निक़ाब को उतार फैंकना चाहते थे और यज़ीदी ताक़त चाहती थी कि हज़रते-हुसैन अपने मॉक़फ़ को तब्दील करके यज़ीद की मुलूकीयत को तस्लीम करें। उसके हाथ में हाथ देकर अपनी इताअत का यक़ीन दिलाएँ, लेकिन हज़रते-हुसैन (रज़ि०) ने कर्बला में दास्ताने-हक़-व-हुर्रियत (हक़ और आज़ादी की दास्तान) को अपने ख़ून की सुर्ख़ी अता करके एक तारीख़ लिख दी कि अपना सर तो दे दिया लेकिन ज़ालिम व जाबिर के हाथ में अपना हाथ न दिया।

यूँ तो कर्बला की दास्तान में मुसलमानों के लिए बहुत-से पैग़ाम हैं। लेकिन उनमें सबसे नुमायाँ और अहम पैग़ाम ये है कि….
■ नाज़ुक से नाज़ुक हालात में भी हम हक़ पर जमे रहें। और हक़ की ख़ातिर अपनी सलाहियतें, अपना वक़्त और माल यहाँ तक कि अपनी जान तक की क़ुरबानी से पीछे न हटें।

यहाँ पर ये बात भी क़ाबिले-ग़ौर है कि लोग नाहक़ के लिए भी अपना सब कुछ क़ुर्बान कर देने के लिये तैयार हो जाते हैं तो हक़ के लिए हमें क्यों तरद्दुद हो????

इस सिलसिले में ये बात भी समझने की है कि हक़ के लिए सब कुछ क़ुर्बान कर देने का जज़्बा ईमान की मज़बूती के बग़ैर कभी पैदा नहीं हो सकता। लिहाज़ा सबसे पहले और सबसे ज़्यादा हमें अपने ईमान को मज़बूत करने की फ़िक्र करनी होगी।

मैदाने-कर्बला से दूसरा पैग़ाम हमें ये मिलता है कि
■ यज़ीदी सिफ़त रखने वाले लोगों की बैअत का हम इनकार कर दें और हक़ को तलाश करके फ़ौरन उस पर लब्बैक कहें और लपक कर बैअत कर लें। ये यज़ीदी सिफ़त रखने वाले लोग सियासी हुक्मराँ भी हो सकते हैं, दीनी जमाअतों और तहरीकों के पेशवा भी हो सकते ।

लेखक: अब्दुर्रहमान ह्युमनिस्ट

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